किराये की साइकिल…

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bicycle

 

पहले हमारे क्षेत्र में बच्चों की साइकिल किराये पर मिलती थी छोटी, लाल रंग की। जिसमें पीछे कैरियर नहीं होता। जिससे आप किसी को डबल न बैठाकर घूमे। एक साईकिल वाले ने तो पिछले मडगार्ड पर धारदार नुकीला पत्ता वेल्ड करवा रखा था। तब किराया शायद 50 पैसे प्रति घंटा होता जिसमें 15, 30, 60 मिनट के स्लैब होते ।

किराये के नियम कड़े होते थे .. जैसे की इसरो का रॉकेट लेना हो। पंचर होने पर पकाने के पैसे, टूट फूट होने पर जिम्मेदारी अलग से, चाबी गुम होने पर नए ताले का शुल्क। खैर ! हम खटारा छुटल्ली साईकिल पर सवार उन गलियों के युवराज होते। ‘बेस्ट अमंग वर्स्ट’ को चुनकर निकल पड़ते। दम फुल पैड़ल मारते, हाथ छोड़कर बैलेंस करते, गिरते-पड़ते चल पड़ते थे।

अपनी गली में आकर सारे दोस्त, बारी बारी से, समय या दूरी के समान अंश में भगाते। किराये के टाइम की लिमिट पार न हो, इसलिए तीन-चार बार साइकिल लेकर दूकान के सामने से निकलते। किराए पर देने वाला साइकिल दस मिनट पहले हमें धर लेता। एडवांस भाड़ा देकर, नाम-पता नोट करके ली साइकिल नुकसानी के साथ जमा हो जाती।

तब किराए पर साइकिल लेना ही अपनी रईसी होती। खुद की अपनी छोटी साइकिल रखने वाले तब रईसी झाड़ते। वैसे हमारे घरों में भी तब पिताजी की, ताऊजी की बड़ी काली साइकिलें ही होती थी। जिसे स्टैंड से उतारने और लगाने में पसीने छूट जाते। जिसे हाथ में लेकर दौड़ते, तो एक पैड़ल पर पैर जमाकर बैलेंस करते।

यह करके फिर कैंची करना सीखें। बाद में डंडे को पार करने का कीर्तिमान बनाया, इसके बाद सीट तक पहुंचने का सफर एक नई ऊंचाई था। फिर सिंगल, डबल, हाथ छोड़कर, कैरियर पर बैठकर साइकिल के खेल किए। ख़ैर जिंदगी की साइकिल अभी भी चल रही है। बस वो दौर वो आनंद नही है।

क्योंकि कोई माने न माने पर जवानी से कहीं अच्छा वो खूबसूरत बचपन ही हुआ करता था साहब.. जिसमें दुश्मनी की जगह सिर्फ एक कट्टी हुआ करती थी और सिर्फ दो उंगलिया जुडने से दोस्ती फिर शुरू हो जाया करती थी। अंततः बचपन एक बार निकल जाने पर सिर्फ यादें ही शेष रह जाती है और रह रह कर याद आकर सताती है।

आजकल पेड़ पर लटके हुए आम भी अपने आप ही गिरने लगे है।

सुना है आज के बच्चों का बचपन एक मोबाईल चुराकर ले गया है।

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